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mahabharat 13.154.d18-d19: ज्ञान से विनम्र हुआ मनुष्य इस संसार में उत्तम जीवन व्यतीत कर सकता है; अतः ज्ञान के द्वारा स्वयं को पुरुषार्थ का विषय बनाकर, क्रोध को जीतकर तथा अपनी इन्द्रियों को वश में करके, समस्त प्राणियों में स्थित आत्मा और परमात्मा का चिन्तन करना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 13.154: अहिंसाकी और इन्द्रिय-संयमकी प्रशंसा तथा दैवकी प्रधानता   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 154: अहिंसाकी और इन्द्रिय-संयमकी प्रशंसा तथा दैवकी प्रधानता  »  श्लोक d18-d19
 
 
श्लोक  13.154.d18-d19 
शक्यं विद्याविनीतेन लोके संजीवनं शुभम्॥
आत्मानं विद्यया तस्मात् पूर्वं कृत्वा तु भाजनम्।
वश्येन्द्रियो जितक्रोधो भूतात्मानं तु भावयेत्॥
 
 
अनुवाद
ज्ञान से विनम्र हुआ मनुष्य इस संसार में उत्तम जीवन व्यतीत कर सकता है; अतः ज्ञान के द्वारा स्वयं को पुरुषार्थ का विषय बनाकर, क्रोध को जीतकर तथा अपनी इन्द्रियों को वश में करके, समस्त प्राणियों में स्थित आत्मा और परमात्मा का चिन्तन करना चाहिए।
 
A man humbled by knowledge can lead a good life in this world; therefore, having first made himself an object of effort through knowledge, a man who has conquered anger and controlled his senses should contemplate on the soul and the Supreme Soul of all beings.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)