श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 154: अहिंसाकी और इन्द्रिय-संयमकी प्रशंसा तथा दैवकी प्रधानता  »  श्लोक d10
 
 
श्लोक  13.154.d10 
मन:पूर्वागमा धर्मा अधर्माश्च न संशय:।
मनसा बद्‍ध्यते चापि मुच्यते चापि मानव:॥
निगृहीते भवेत् स्वर्गो विसृष्टे नरको ध्रुव:।
 
 
अनुवाद
इसमें कोई संदेह नहीं कि धर्म और अधर्म सबसे पहले मन में ही आते हैं। मन से ही मनुष्य बंधता है और मन से ही मुक्त होता है। यदि मन को वश में कर लिया जाए, तो स्वर्ग की प्राप्ति होती है और यदि इसे मुक्त छोड़ दिया जाए, तो नरक की प्राप्ति अवश्य होती है।
 
There is no doubt that Dharma and Adharma first come in the mind. It is through the mind that a man is bound and it is through the mind that he is liberated. If the mind is controlled, then one attains heaven and if it is left free, then one is bound to reach hell.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)