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श्री महाभारत
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पर्व 13: अनुशासन पर्व
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अध्याय 154: अहिंसाकी और इन्द्रिय-संयमकी प्रशंसा तथा दैवकी प्रधानता
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श्लोक d1
श्लोक
13.154.d1
उमोवाच
देवदेव महादेव सर्वदेवनमस्कृत।
यानि धर्मरहस्यानि श्रोतुमिच्छामि तान्यहम्॥
अनुवाद
उमा बोलीं- सर्वप्रिय देवाधिदेव महादेव! अब मैं धर्म का रहस्य सुनना चाहती हूँ।
Uma said – All-loved Devadhidev Mahadev! Now I want to hear the secrets of religion.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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