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mahabharat 13.152.d4-d5: जब भीषण युद्ध में वीर योद्धा लड़ते और मारे जाते हैं, तब जो दुर्दांत सैनिक सेनापति की अनिच्छा के बावजूद भी बिना घायल हुए युद्ध से पीठ फेर लेते हैं, वे सेनापति के सारे पाप अपने ऊपर ले लेते हैं और उन भगोड़ों के जो भी पुण्य कर्म होते हैं, वे सेनापति को प्राप्त हो जाते हैं।   |   mahabharat अध्याय 13.152: योद्धाओंके धर्मका वर्णन तथा रणयज्ञमें प्राणोत्सर्गकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 152: योद्धाओंके धर्मका वर्णन तथा रणयज्ञमें प्राणोत्सर्गकी महिमा  »  श्लोक d4-d5
 
 
श्लोक  13.152.d4-d5 
हन्यमानेष्वभिघ्नत्सु शूरेषु रणसंकटे।
पृष्ठं दत्त्वा च ये तत्र नायकस्य नराधमा:॥
अनाहता निवर्तन्ते नायके चाप्यनीप्सति।
ते दुष्कृतं प्रपद्यन्ते नायकस्याखिलं नरा:॥
यच्चास्ति सुकृतं तेषां युज्यते तेन नायक:।
 
 
अनुवाद
जब भीषण युद्ध में वीर योद्धा लड़ते और मारे जाते हैं, तब जो दुर्दांत सैनिक सेनापति की अनिच्छा के बावजूद भी बिना घायल हुए युद्ध से पीठ फेर लेते हैं, वे सेनापति के सारे पाप अपने ऊपर ले लेते हैं और उन भगोड़ों के जो भी पुण्य कर्म होते हैं, वे सेनापति को प्राप्त हो जाते हैं।
 
When in a fierce battle brave warriors are fighting and getting killed, the wretched soldiers who turn their backs and turn away from the battle without getting injured, despite the commander's unwillingness, take upon themselves all the sins of the commander and whatever good deeds those fugitives have, the commander receives them.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)