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mahabharat 13.152.d28-d29: जहाँ राजा धर्मपूर्वक अपनी प्रजा का पालन करता है और जहाँ पितरों और देवताओं के साथ-साथ छह कर्म करने वाले ब्राह्मणों की भी पूजा होती है, उस देश में न तो सूखा पड़ता है, न रोग का प्रकोप होता है और न ही किसी प्रकार का उपद्रव होता है। जब राजा स्वधर्म में तत्पर रहता है, तो वहाँ की सारी प्रजा धर्ममय होती है।   |   mahabharat अध्याय 13.152: योद्धाओंके धर्मका वर्णन तथा रणयज्ञमें प्राणोत्सर्गकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 152: योद्धाओंके धर्मका वर्णन तथा रणयज्ञमें प्राणोत्सर्गकी महिमा  »  श्लोक d28-d29
 
 
श्लोक  13.152.d28-d29 
प्रजा: पालयते यत्र धर्मेण वसुधाधिप:।
षट्कर्मनिरता विप्रा: पूज्यन्ते पितृदैवतै:॥
नैव तस्मिन्ननावृष्टिर्न रोगा नाप्युपद्रवा:।
धर्मशीला: प्रजा: सर्वा: स्वधर्मनिरते नृपे॥
 
 
अनुवाद
जहाँ राजा धर्मपूर्वक अपनी प्रजा का पालन करता है और जहाँ पितरों और देवताओं के साथ-साथ छह कर्म करने वाले ब्राह्मणों की भी पूजा होती है, उस देश में न तो सूखा पड़ता है, न रोग का प्रकोप होता है और न ही किसी प्रकार का उपद्रव होता है। जब राजा स्वधर्म में तत्पर रहता है, तो वहाँ की सारी प्रजा धर्ममय होती है।
 
Where the king takes care of his subjects in a righteous manner and where the Brahmins who perform the six duties are worshipped along with the ancestors and the gods, there is neither drought nor disease attack nor any kind of disturbance in that country. When the king is devoted to his own religion, all the subjects there are righteous.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)