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श्लोक 13.151.d4  |
स चापि दण्डयन् मर्त्यान् भर्त्सयन् विविधानपि।
प्रेत्यभावे कथं लोकाँल्लभते पुण्यकर्मणाम्॥
राजवृत्तमहं तस्माच्छ्रोतुमिच्छामि मानद। |
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| अनुवाद |
| यह राजा नाना प्रकार से मनुष्यों को दण्ड और फटकार देता है। मृत्यु के पश्चात् इसे पुण्यात्माओं का लोक कैसे प्राप्त होता है? हे महात्मन! अतः मैं राजा के आचरण और व्यवहार का वर्णन सुनना चाहता हूँ। |
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| This king punishes and rebukes people in various ways. How does he attain the world of virtuous souls after death? O Honorable! Therefore, I want to hear the description of the conduct and behavior of the king. |
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