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श्लोक 13.150.64  |
एष देवि मया सर्व: संशयच्छेदनाय ते।
कुशलाकुशलो नॄृणां व्याख्यातो धर्मसागर:॥ ६४॥ |
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| अनुवाद |
| देवी! यह धर्मसागर पुण्यात्माओं को प्रिय और पापियों को अप्रिय है। मैंने यह सब तुम्हारे संदेह दूर करने के लिए विस्तारपूर्वक बताया है। |
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| Devi! This ocean of Dharma is dear to the virtuous and unpleasant to the sinful. I have explained all this in detail to clear your doubts. |
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इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उमामहेश्वरसंवादे पञ्चचत्वारिंशदधिक शततमोऽध्याय:॥ १४५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमामहेश्वरसंवादविषयक एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४५॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १२०९ श्लोक मिलाकर कुल १२७३ श्लोक हैं, this chapter split into 17chapters, this and next 16) |
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