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श्लोक 13.150.54  |
उमोवाच
सावद्यं किन्नु वै कर्म निरवद्यं तथैव च।
श्रेय: कुर्वन्नवाप्नोति मानवो देवसत्तम॥ ५४॥ |
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| अनुवाद |
| पार्वती ने पूछा- देवश्रेष्ठ! कौन-से कर्म दोषयुक्त हैं और कौन-से निर्दोष हैं, किन कर्मों को करने से मनुष्य कल्याण का भागी होता है? 54॥ |
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| Parvati asked-Devshrestha! Which deeds are guilty and which are innocent, by doing which deeds does a man become a part of welfare? 54॥ |
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