श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 150: स्वर्ग और नरक तथा उत्तम और अधम कुलमें जन्मकी प्राप्ति करानेवाले कर्मोंका वर्णन  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  13.150.54 
उमोवाच
सावद्यं किन्नु वै कर्म निरवद्यं तथैव च।
श्रेय: कुर्वन्नवाप्नोति मानवो देवसत्तम॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
पार्वती ने पूछा- देवश्रेष्ठ! कौन-से कर्म दोषयुक्त हैं और कौन-से निर्दोष हैं, किन कर्मों को करने से मनुष्य कल्याण का भागी होता है? 54॥
 
Parvati asked-Devshrestha! Which deeds are guilty and which are innocent, by doing which deeds does a man become a part of welfare? 54॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd