श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 150: स्वर्ग और नरक तथा उत्तम और अधम कुलमें जन्मकी प्राप्ति करानेवाले कर्मोंका वर्णन  »  श्लोक 41-42
 
 
श्लोक  13.150.41-42 
स चेत् कर्मक्षयान्मर्त्यो मनुष्येषूपजायते।
अल्पाबाधो निरातङ्क: स जात: सुखमेधते॥ ४१॥
सुखभागी निरायासो निरुद्वेग: सदा नर:।
एष देवि सतां मार्गो बाधा यत्र न विद्यते॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
फिर यदि वह अपने पुण्य कर्मों के क्षीण हो जाने पर मृत्युलोक में जन्म लेता है, तो उसे विघ्नों का प्रभाव कम होता है । वह निर्भय होकर सुखपूर्वक उन्नति करता है । सुख का भागी होकर वह बिना परिश्रम और चिंता के अपना जीवन व्यतीत करता है । देवि ! यह सत्पुरुषों का मार्ग है, जहाँ किसी भी प्रकार की विघ्न-बाधा नहीं आती ॥41-42॥
 
Then if he is born in the mortal world after his good deeds are exhausted, then he is less affected by obstacles. He progresses fearlessly and happily. Being a part of happiness, he spends his life without effort and anxiety. Goddess! This is the path of the good men, where no obstacles of any kind come. ॥ 41-42॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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