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श्लोक 13.150.15  |
क्षुत्पिपासापरीताश्च सर्वलोकबहिष्कृता:।
निराशा: सर्वभोगेभ्यो जीवन्त्यधर्मजीविकाम्॥ १५॥ |
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| अनुवाद |
| वहाँ वे सदैव भूख-प्यास से पीड़ित रहते हैं। सब लोग उनका बहिष्कार करते हैं और सब प्रकार के सुखों से विरक्त होकर वे पापकर्मों से जीविका चलाते हैं॥15॥ |
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| There they always suffer from hunger and thirst. Everyone ostracises them and being disillusioned with all kinds of pleasures they earn their living by sinful acts.॥ 15॥ |
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