श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 150: स्वर्ग और नरक तथा उत्तम और अधम कुलमें जन्मकी प्राप्ति करानेवाले कर्मोंका वर्णन  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  13.150.11 
दीनान्धकृपणान् दृष्ट्वा भिक्षुकानतिथीनपि।
याच्यमाना निवर्तन्ते जिह्वालोभसमन्विता:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
वे दीन-दुखियों, अंधे, दरिद्रों, भिखारियों और अतिथियों की ओर से मुँह फेर लेते हैं। जब वे भीख माँगते हैं, तब भी अपनी जीभ के लोभ के कारण उन्हें भोजन नहीं देते। ॥11॥
 
They turn away from the sight of the downtrodden, the blind, the poor, the beggars and guests. Even when they beg, they do not give them food due to the greed of their tongue. ॥11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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