| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन » श्लोक d3-d4 |
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| | | | श्लोक 13.15.d3-d4  | (महाभूतानि च्छन्दांसि प्रजानां पतयो मखा:।
सरित: सागरा नागा गन्धर्वाप्सरसस्तथा॥
विद्याधराश्च गीतेन वाद्यनृत्तादिनार्चयन्।
तेजस्विनां मध्यगतं तेजोराशिं जगत्पतिम्॥ ) | | | | | | अनुवाद | | महाभूत, छंद, प्रजापति, यज्ञ, नदी, समुद्र, सर्प, गंधर्व, अप्सरा और विद्याधर - ये सभी तेजस्वी के मध्य भाग में स्थित तेजस्विनी जगदीश्वर शिव की स्तुति गान, वाद्य और नृत्य आदि के द्वारा किया करते थे। | | | | Mahabhuta, Chhanda, Prajapati, Yagya, river, sea, snake, Gandharva, Apsara and Vidyadhar - all of them used to worship Jagdishwar Shiva, the shining light seated in the middle part of the Tejaswis, through songs, musical instruments and dance etc. | | ✨ ai-generated | | |
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