श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक d1
 
 
श्लोक  13.15.d1 
(दिवसकरशशाङ्कवह्निनेत्रं
त्रिभुवनसारमपारमीशमाद्यम्।
अजरममरमप्रसाद्य रुद्रं
जगति पुमानिह को लभेत शान्तिम्॥ )
 
 
अनुवाद
जिनके नेत्र सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि हैं, जो त्रिभुवन के सार हैं, अनन्त परमेश्वर हैं, सबके मूल कारण हैं और जो अमर हैं, उन रुद्रदेव को प्रसन्न किए बिना इस संसार में कौन शांति पा सकता है?
 
Who can find peace in this world without pleasing Rudradeva, whose eyes are the Sun, the Moon and the Fire, who is the essence of the Tribhuvan, the infinite God, the original cause of all and who is immortal?
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas