श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 95-96h
 
 
श्लोक  13.15.95-96h 
अत्रेर्भार्यापि भर्तारं संत्यज्य ब्रह्मवादिनी।
नाहं तस्य मुनेर्भूयो वशगा स्यां कथंचन॥ ९५॥
इत्युक्त्वा सा महादेवमगच्छच्छरणं किल।
 
 
अनुवाद
किसी समय अत्रि की पत्नी ब्रह्मवादिनी अनसूया रुष्ट होकर अपने पति को छोड़कर महादेव की शरण में चली गईं और मन में यह निश्चय कर लिया कि 'मैं अब कभी भी अत्रि ऋषि के प्रभाव में नहीं आऊँगी' ॥95 1/2॥
 
At some point of time, Atri's wife, the Brahmavaadini Anasuya, became angry and left her husband and went to Mahadeva for refuge, with the resolve in her mind that 'I will never again be under the influence of the sage Atri'. ॥95 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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