श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 93-94
 
 
श्लोक  13.15.93-94 
महादेवस्य रोषाच्च आपो नष्टा: पुराभवन्॥ ९३॥
ताश्च सप्तकपालेन देवैरन्या: प्रवर्तिता:।
तत: पानीयमभवत् प्रसन्ने त्र्यम्बके भुवि॥ ९४॥
 
 
अनुवाद
पहले महादेव के क्रोध से जल नष्ट हो गया था। तब देवताओं ने, जिनके स्वामी रुद्र हैं, सप्त कपालयाग द्वारा दूसरा जल प्राप्त किया। इस प्रकार त्रिनेत्रधारी भगवान शिव के प्रसन्न होने पर ही पृथ्वी पर जल उपलब्ध हुआ ॥93-94॥
 
Earlier, water was destroyed due to Mahadev's anger. Then the gods, whose lord is Rudra, obtained another water through the Sapta Kapalayag. In this way, water was available on the earth only when the three-eyed Lord Shiva was pleased. ॥93-94॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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