श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 84-85h
 
 
श्लोक  13.15.84-85h 
कुशद्वीपं च स ददौ राज्येन भगवानज:।
तथा शतमुखो नाम धात्रा सृष्टो महासुर:॥ ८४॥
येन वर्षशतं साग्रमात्ममांसैर्हुतोऽनल:।
 
 
अनुवाद
अजन्मे भगवान शिव ने उसे कुशद्वीप पर शासन करने के लिए दिया था। इसी प्रकार ब्रह्माजी ने एक बार शतमुख नामक महादैत्य को उत्पन्न किया था, जिसने सौ वर्षों से भी अधिक समय तक अग्नि में अपने शरीर की आहुति दी थी। 84 1/2॥
 
The unborn Lord Shiva had given him Kushdweep to rule. Similarly, Lord Brahma had once created a great demon named Shatmukh, who sacrificed his own flesh in fire for more than a hundred years. 84 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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