श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 78-79
 
 
श्लोक  13.15.78-79 
न शक्यं द्रष्टुमन्येन वर्जयित्वा पिनाकिनम्।
सुदर्शनं भवत्येवं भवेनोक्तं तदा तु तत्॥ ७८॥
सुदर्शनं तदा तस्य लोके नाम प्रतिष्ठितम्।
तज्जीर्णमभवत् तात ग्रहस्याङ्गेषु केशव॥ ७९॥
 
 
अनुवाद
पिनाकपाणि भगवान शंकर के अतिरिक्त कोई भी इसे देख नहीं सकता था। उस समय भगवान शंकर ने कहा- 'यह अस्त्र सुदर्शन (देखने में आसान) हो जाए।' तभी से यह संसार में सुदर्शन के नाम से प्रसिद्ध हुआ। हे केशव! ऐसा प्रसिद्ध अस्त्र भी उस लोक के अंगों पर घिस गया। 78-79।
 
No one could see it except Pinakapani Bhagwan Shankar. At that time Bhagwan Shankar said- 'Let this weapon become Sudarshan (easy to see).' Since then it became known as Sudarshan in the world. Dear Keshav! Even such a famous weapon became worn out on the body parts of that planet. 78-79.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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