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mahabharat 13.15.76-77: हे निष्पाप श्रीकृष्ण! प्राचीन काल में भगवान शंकर ने जल के भीतर रहने वाले अभिमानी दैत्य का वध करके अग्नि के समान तेजस्वी चक्र नामक अस्त्र तुम्हें प्रदान किया था। स्वयं भगवान वृषध्वज ने उस अस्त्र का निर्माण करके तुम्हें प्रदान किया था, जो अद्भुत तेज से युक्त और महान बल वाला है। 76-77॥   |   mahabharat अध्याय 13.15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 76-77
 
 
श्लोक  13.15.76-77 
यत् तद् भगवता पूर्वं दत्तं चक्रं तवानघ।
जलान्तरचरं हत्वा दैत्यं च बलगर्वितम्॥ ७६॥
उत्पादितं वृषाङ्केन दीप्तज्वलनसंनिभम्।
दत्तं भगवता तुभ्यं दुर्धर्षं तेजसाद्भुतम्॥ ७७॥
 
 
अनुवाद
हे निष्पाप श्रीकृष्ण! प्राचीन काल में भगवान शंकर ने जल के भीतर रहने वाले अभिमानी दैत्य का वध करके अग्नि के समान तेजस्वी चक्र नामक अस्त्र तुम्हें प्रदान किया था। स्वयं भगवान वृषध्वज ने उस अस्त्र का निर्माण करके तुम्हें प्रदान किया था, जो अद्भुत तेज से युक्त और महान बल वाला है। 76-77॥
 
Sinless Shri Krishna! In ancient times, Lord Shankar had given you the Chakra, a weapon as bright as fire after killing the proud demon who lived under water. Lord Vrishadhwaj himself had created and given you that weapon, which is full of amazing brilliance and has great strength. 76-77॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)