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श्लोक 13.15.75  |
विष्णोश्चक्रं च तद् घोरं वज्रमाखण्डलस्य च।
शीर्णं पुराभवत् तात ग्रहस्याङ्गेषु केशव॥ ७५॥ |
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| अनुवाद |
| हे केशव! भगवान विष्णु का वह भयानक चक्र और इन्द्र का वह वज्र पूर्वकाल में उस लोक के अंगों पर पड़े हुए पुराने तिनकों के समान जीर्ण-शीर्ण हो गये थे। |
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| O dear Keshav! That dreadful discus of Lord Vishnu and the thunderbolt of Indra had in the past become worn out like old straws on the limbs of that planet. |
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