श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 71-72
 
 
श्लोक  13.15.71-72 
तेजसां तपसां चैव निधि: स भगवानिह॥ ७१॥
शुभाशुभान्वितान् भावान् विसृजन् संक्षिपन्नपि।
आस्ते देव्या सदाचिन्त्यो यं प्रार्थयसि शत्रुहन्॥ ७२॥
 
 
अनुवाद
हे शत्रुओं का नाश करने वाले श्रीकृष्ण! तुम जिनकी स्तुति करते हो, वे अचिन्त्य भगवान शंकर, जो तेज और तप के भंडार हैं, वे यहाँ देवी पार्वती के साथ सदैव निवास करते हैं, शम (शांति) आदि शुभ भावों को उत्पन्न करते हैं और काम आदि अशुभ भावों का नाश करते हैं।
 
Shri Krishna, the destroyer of enemies! The one whom you pray to, the inconceivable Lord Shankar, who is the repository of brilliance and austerity, resides here always with Goddess Parvati, creating auspicious feelings like shama (peace) and destroying inauspicious feelings like lust (kaam) etc.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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