श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  13.15.56 
वाय्वाहारैरम्बुपैर्जप्यनित्यै:
सम्प्रक्षालैर्योगिभिर्ध्याननित्यै:।
धूूमप्राशैरूष्मपै: क्षीरपैश्च
संजुष्टं च ब्राह्मणेन्द्रै: समन्तात्॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
वहाँ सर्वत्र श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते थे। उनमें से कुछ केवल वायु पीकर जीवन निर्वाह करते थे। कुछ लोग जल पीकर अपना भरण-पोषण करते थे। कुछ लोग निरन्तर जप में लगे रहते थे। कुछ साधक मैत्री-मुदिता आदि साधनाओं द्वारा अपने मन को शुद्ध करते थे। कुछ योगी निरन्तर ध्यान में लीन रहते थे। कुछ अग्निहोत्र के धूम्र से, कुछ सूर्य की उष्ण किरणों से और कुछ दूध पीकर जीवन निर्वाह करते थे॥ 56॥
 
There lived the best Brahmins everywhere. Some of them lived by drinking only air. Some people sustained themselves by drinking water. Some people were constantly engaged in chanting. Some sadhaks purified their minds by sadhnas like Maitri-Mudita etc. Some Yogis were constantly engrossed in meditation. Some lived by the smoke of Agnihotra, some by the hot rays of the sun and some by drinking milk.॥ 56॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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