श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  13.15.49 
नानाशकुनिसम्भोज्यै: फलैर्वृक्षैरलंकृतम्।
यथास्थानविनिक्षिप्तैर्भूषितं भस्मराशिभि:॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
फल और विभिन्न पक्षियों के खाने योग्य वृक्ष उस आश्रम के आभूषण थे। उचित स्थान पर रखी हुई राख उसकी शोभा बढ़ा रही थी।
 
Fruits and trees edible for various birds were the ornaments of that hermitage. The ashes kept in their proper places were adding to its beauty. 49.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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