श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  13.15.45 
दिव्यं वैयाघ्रपद्यस्य उपमन्योर्महात्मन:।
पूजितं देवगन्धर्वैर्ब्राह्मॺा लक्ष्म्या समावृतम्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
वह व्याघ्रपाद के पुत्र महापुरुष उपमन्यु का दिव्य आश्रम था, जो ब्रह्म तेज से संपन्न था और देवताओं तथा गंधर्वों द्वारा सम्मानित था।
 
That was the divine hermitage of the great soul Upamanyu, son of Vyaghrapada, who was endowed with brahmic splendor and was respected by the gods and Gandharvas. 45.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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