श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  13.15.44 
तत्राहमद्भुतान् भावानपश्यं गिरिसत्तमे।
क्षेत्रं च तपसां श्रेष्ठं पश्याम्यद्भुतमुत्तमम्॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
उस महान पर्वत पर मैंने अद्भुत भाव देखे। वहाँ का स्थान मुझे अद्भुत, उत्तम और ध्यान के लिए उत्तम स्थान लगा ॥44॥
 
I saw wonderful emotions on that great mountain. I found the place there to be wonderful, excellent and the best place for meditation. ॥ 44॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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