श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 428
 
 
श्लोक  13.15.428 
विदु: कृष्ण परां भक्तिमस्मासु तव शत्रुहन्।
क्रियतामात्मन: श्रेय: प्रीतिर्हि त्वयि मे परा॥ ४२८॥
 
 
अनुवाद
हे शत्रुओं का संहार करने वाले श्रीकृष्ण! मुझ पर आपकी अनन्य भक्ति सर्वत्र विदित है। अब आप अपना कल्याण करें, क्योंकि मेरा आप पर विशेष प्रेम है॥ 428॥
 
Slayer of enemies, Sri Krishna! Your extreme devotion towards me is known to everyone. Now do good to yourself because I have special love for you.॥ 428॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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