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श्लोक 13.15.428  |
विदु: कृष्ण परां भक्तिमस्मासु तव शत्रुहन्।
क्रियतामात्मन: श्रेय: प्रीतिर्हि त्वयि मे परा॥ ४२८॥ |
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| अनुवाद |
| हे शत्रुओं का संहार करने वाले श्रीकृष्ण! मुझ पर आपकी अनन्य भक्ति सर्वत्र विदित है। अब आप अपना कल्याण करें, क्योंकि मेरा आप पर विशेष प्रेम है॥ 428॥ |
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| Slayer of enemies, Sri Krishna! Your extreme devotion towards me is known to everyone. Now do good to yourself because I have special love for you.॥ 428॥ |
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