श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 426
 
 
श्लोक  13.15.426 
मम मूर्ध्नि च दिव्यानां कुसुमानां सुगन्धिनाम्।
राशयो निपतन्ति स्म वायुश्च सुसुखो ववौ॥ ४२६॥
 
 
अनुवाद
मेरे सिर पर दिव्य सुगन्धित पुष्पों की वर्षा होने लगी और अत्यन्त सुखदायक वायु बहने लगी ॥426॥
 
A shower of divinely fragrant flowers began to fall on my head and a very soothing breeze began to blow. ॥ 426॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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