श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 424
 
 
श्लोक  13.15.424 
एवमुक्ते मया पार्थ भवे चार्तिविनाशने।
चराचरं जगत‍् सर्वं सिंहनादं तदाकरोत् ॥ ४२४॥
 
 
अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! जब मैंने इस प्रकार सबके दुःख दूर करने वाले महादेवजी की स्तुति की, तब चर-अचर सम्पूर्ण जगत गर्जना करने लगा॥424॥
 
O son of Kunti! When I thus praised Mahadevji, who removes the suffering of all, then the entire animate and inanimate world started roaring. ॥ 424॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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