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श्लोक 13.15.424  |
एवमुक्ते मया पार्थ भवे चार्तिविनाशने।
चराचरं जगत् सर्वं सिंहनादं तदाकरोत् ॥ ४२४॥ |
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| अनुवाद |
| हे कुन्तीपुत्र! जब मैंने इस प्रकार सबके दुःख दूर करने वाले महादेवजी की स्तुति की, तब चर-अचर सम्पूर्ण जगत गर्जना करने लगा॥424॥ |
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| O son of Kunti! When I thus praised Mahadevji, who removes the suffering of all, then the entire animate and inanimate world started roaring. ॥ 424॥ |
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