श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 420
 
 
श्लोक  13.15.420 
त्वं वै प्रभार्चि: पुरुष: सर्वस्य हृदि संश्रित:।
अणिमा महिमा प्राप्तिरीशानो ज्योतिरव्यय:॥ ४२०॥
 
 
अनुवाद
हे अविनाशी परमेश्वर, आप सूर्य के तेज और अग्नि की ज्वाला हैं। आप सबके हृदय में आत्मा के रूप में निवास करते हैं। आप अणिमा, महिमा और प्राप्ति जैसी सिद्धियाँ और प्रकाश भी हैं ॥420॥
 
You, the immortal God, are the radiance of the Sun and the flame of the fire. You reside in the heart of everyone as the soul. You are the siddhis like anima, mahima and prapti and also the light. ॥ 420॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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