श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 416-417
 
 
श्लोक  13.15.416-417 
महानात्मा मतिर्ब्रह्मा विश्व: शम्भु: स्वयम्भुव:।
बुद्धि: प्रज्ञोपलब्धिश्च संवित् ख्यातिर्धृति: स्मृति:॥ ४१६॥
पर्यायवाचकै: शब्दैर्महानात्मा विभाव्यते।
त्वां बुद्‍ध्वा ब्राह्मणो वेदात् प्रमोहं विनियच्छति॥ ४१७॥
 
 
अनुवाद
आप ही परमात्मा, इन चौदह पर्यायवाची शब्दों से प्रकट होते हैं - महान, आत्मा, मति, ब्रह्म, विश्व, शम्भू, स्वयंभू, बुद्धि, प्रज्ञा, प्राप्ति, संवित्, ख्याति, धृति और स्मृति। वेदों से ज्ञान प्राप्त कर ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण समस्त आसक्ति का पूर्णतः नाश कर देता है।
 
You, the Supreme Soul, are revealed through these fourteen synonymous words - Mahan, Atma, Mati, Brahma, Vishva, Shambhu, Swayambhu, Buddhi, Pragya, Attainment, Samvit, Khyati, Dhriti and Smriti. After gaining knowledge from the Vedas, a Brahmagyani Brahmin completely destroys all attachment.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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