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mahabharat 13.15.415: आप अव्यक्त, शुद्ध, अचिन्त्य, हरित सूर्यस्वरूप होकर सम्पूर्ण गणों के मूल कारण और जीवन के आश्रय हैं ॥415॥   |   mahabharat अध्याय 13.15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 415
 
 
श्लोक  13.15.415 
अव्यक्त: पावनोऽचिन्त्य: सहस्रांशुर्हिरण्मय:।
आदिर्गणानां सर्वेषां भवान् वै जीविताश्रय:॥ ४१५॥
 
 
अनुवाद
आप अव्यक्त, शुद्ध, अचिन्त्य, हरित सूर्यस्वरूप होकर सम्पूर्ण गणों के मूल कारण और जीवन के आश्रय हैं ॥415॥
 
You, in the form of the unmanifested, pure, unimaginable, green sun, are the original cause of all the Ganas and the shelter of life. 415॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)