| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन » श्लोक 414 |
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| | | | श्लोक 13.15.414  | कृतिर्विकार: प्रणय: प्रधानं बीजमव्ययम्।
मनस: परमा योनि: प्रभावश्चापि शाश्वत:॥ ४१४॥ | | | | | | अनुवाद | | कर्म, रूप, प्रेम, प्रधान, अविनाशी बीज, मन का परम कारण और शाश्वत कार्य - ये भी आपके ही स्वरूप हैं ॥414॥ | | | | Action, transformation, love, the prime, the imperishable seed, the ultimate cause of the mind and the eternal effect – these too are Your manifestations. ॥414॥ | | ✨ ai-generated | | |
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