| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन » श्लोक 412 |
|
| | | | श्लोक 13.15.412  | इष्टं दत्तमधीतं च व्रतानि नियमाश्च ये।
ह्री: कीर्ति: श्रीर्द्युतिस्तुष्टि: सिद्धिश्चैव तदर्पणी॥ ४१२॥ | | | | | | अनुवाद | | यज्ञ, दान, अध्ययन, व्रत और नियम, शील, यश, ऐश्वर्य, तेज, संतोष और सिद्धि - ये सब आपके स्वरूप की प्राप्ति कराने वाले हैं ॥412॥ | | | | Sacrifices, charity, studies, vows and discipline, modesty, fame, prosperity, radiance, satisfaction and success - all these lead to attainment of your form. ॥ 412॥ | | ✨ ai-generated | | |
|
|