श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 410
 
 
श्लोक  13.15.410 
यानीन्द्रियाणीह मनश्च कृत्स्नं
ये वायव: सप्त तथैव चाग्नय:।
ये देवसंस्थास्तवदेवताश्च
तस्मात् परं त्वामृषयो वदन्ति॥ ४१०॥
 
 
अनुवाद
आप समस्त इन्द्रियों, सम्पूर्ण मन, सम्पूर्ण वायु और सात अग्नियों से परे हैं तथा देव समुदाय में स्तुति करने योग्य देवताओं से भी परे हैं। ॥410॥
 
You are beyond all the senses, the entire mind, the entire air and the seven fires*, and the deities who are worthy of being praised in the community of gods. The sages say the same about you.॥ 410॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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