श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 396-400
 
 
श्लोक  13.15.396-400 
सनत्कुमारो देवाश्च इतिहासास्तथैव च।
मरीचिरङ्गिरा अत्रि: पुलस्त्य: पुलह: क्रतु:॥ ३९६॥
मनव: सप्त सोमश्च अथर्वा सबृहस्पति:।
भृगुर्दक्ष: कश्यपश्च वसिष्ठ: काश्य एव च॥ ३९७॥
छन्दांसि दीक्षा यज्ञाश्च दक्षिणा: पावको हवि:।
यज्ञोपगानि द्रव्याणि मूर्तिमन्ति युधिष्ठिर॥ ३९८॥
प्रजानां पालका: सर्वे सरित: पन्नगा नगा:।
देवानां मातर: सर्वा देवपत्न्य: सकन्यका:॥ ३९९॥
सहस्राणि मुनीनां च अयुतान्यर्बुदानि च।
नमस्यन्ति प्रभुं शान्तं पर्वता: सागरा दिश:॥ ४००॥
 
 
अनुवाद
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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