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mahabharat 13.15.390: इस प्रकार मैंने महादेव की स्तुति की, जो मन को वश में रखते हैं और अपनी कर्मेन्द्रियों द्वारा केवल शुभ कर्मों को सम्पन्न करते हैं तथा जो ग्यारह सौ रुद्रों से घिरे हुए हैं।   |   mahabharat अध्याय 13.15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 390
 
 
श्लोक  13.15.390 
एकादशशतान्येवं रुद्राणां वृषवाहनम्।
अस्तुवं नियतात्मानं कर्मभि: शुभकर्मिणम्॥ ३९०॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार मैंने महादेव की स्तुति की, जो मन को वश में रखते हैं और अपनी कर्मेन्द्रियों द्वारा केवल शुभ कर्मों को सम्पन्न करते हैं तथा जो ग्यारह सौ रुद्रों से घिरे हुए हैं।
 
In this manner I praised Mahadeva, who controls the mind and performs only auspicious deeds through his organs of action and who is surrounded by eleven hundred Rudras.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)