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mahabharat 13.15.386: हे कुन्तीपुत्र! जो सम्पूर्ण देव समुदाय का मूल है और जो सबका दुःख हरता है, उस परम पुरुष को जब मैंने देखा, तब मेरे रोंगटे खड़े हो गए और मेरे नेत्र आश्चर्य से चमक उठे ॥386॥   |   mahabharat अध्याय 13.15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 386
 
 
श्लोक  13.15.386 
संहृष्टरोमा कौन्तेय विस्मयोत्फुल्ललोचन:।
अपश्यं देवसंघानां गतिमार्तिहरं हरम्॥ ३८६॥
 
 
अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! जो सम्पूर्ण देव समुदाय का मूल है और जो सबका दुःख हरता है, उस परम पुरुष को जब मैंने देखा, तब मेरे रोंगटे खड़े हो गए और मेरे नेत्र आश्चर्य से चमक उठे ॥386॥
 
O son of Kunti! When I saw the Supreme Being who is the source of the whole community of gods and who takes away the pain of all, my hair stood on end and my eyes lit up with wonder. ॥ 386॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)