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श्लोक 13.15.382-383  |
तेज: सूर्यसहस्रस्य अपश्यं दिवि भारत।
तस्य मध्यगतं चापि तेजस: पाण्डुनन्दन॥ ३८२॥
इन्द्रायुधपिनद्धाङ्गं विद्युन्मालागवाक्षकम्।
नीलशैलचयप्रख्यं वलाकाभूषिताम्बरम्॥ ३८३॥ |
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| अनुवाद |
| भरत! हे पाण्डुपुत्र! छठे महीने में मैंने आकाश में सहस्रों सूर्यों के समान तेज देखा। उस तेज के भीतर मैंने एक और तेज देखा, जिसका सम्पूर्ण शरीर इन्द्रधनुष से घिरा हुआ था। उसमें बिजली की लड़ियाँ एक खिड़की के समान दिखाई दे रही थीं। वह तेज नीली पर्वत श्रृंखला के समान चमक रहा था। उस द्विगुणित तेज के कारण वहाँ का आकाश ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह सारसों की पंक्तियों से सुशोभित हो। 382-383। |
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| Bharata! O son of Pandu! In the sixth month I saw the brightness of thousands of Suns in the sky. Within that brightness, I saw another brightness, whose entire body was surrounded by a rainbow. The string of lightning appeared like a window in it. That brightness shone like a blue mountain range. Due to that dual brightness, the sky there appeared as if it was decorated with rows of cranes. 382-383. |
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