Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.15.382-383: भरत! हे पाण्डुपुत्र! छठे महीने में मैंने आकाश में सहस्रों सूर्यों के समान तेज देखा। उस तेज के भीतर मैंने एक और तेज देखा, जिसका सम्पूर्ण शरीर इन्द्रधनुष से घिरा हुआ था। उसमें बिजली की लड़ियाँ एक खिड़की के समान दिखाई दे रही थीं। वह तेज नीली पर्वत श्रृंखला के समान चमक रहा था। उस द्विगुणित तेज के कारण वहाँ का आकाश ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह सारसों की पंक्तियों से सुशोभित हो। 382-383। | mahabharat अध्याय 13.15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
भरत! हे पाण्डुपुत्र! छठे महीने में मैंने आकाश में सहस्रों सूर्यों के समान तेज देखा। उस तेज के भीतर मैंने एक और तेज देखा, जिसका सम्पूर्ण शरीर इन्द्रधनुष से घिरा हुआ था। उसमें बिजली की लड़ियाँ एक खिड़की के समान दिखाई दे रही थीं। वह तेज नीली पर्वत श्रृंखला के समान चमक रहा था। उस द्विगुणित तेज के कारण वहाँ का आकाश ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह सारसों की पंक्तियों से सुशोभित हो। 382-383।
Bharata! O son of Pandu! In the sixth month I saw the brightness of thousands of Suns in the sky. Within that brightness, I saw another brightness, whose entire body was surrounded by a rainbow. The string of lightning appeared like a window in it. That brightness shone like a blue mountain range. Due to that dual brightness, the sky there appeared as if it was decorated with rows of cranes. 382-383.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥