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श्लोक 13.15.361  |
भविष्यति द्विजश्रेष्ठ मयि भक्तिश्च शाश्वती।
सांनिध्यं चाश्रमे नित्यं करिष्यामि द्विजोत्तम॥ ३६१॥ |
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| अनुवाद |
| द्विजश्रेष्ठ! मैं सदैव आपमें और द्विजप्रवर में अटूट भक्ति रखूँगा! मैं सदैव आपके इस आश्रम के निकट अदृश्य रूप से निवास करूँगा ॥361॥ |
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| Dwijshreshtha! I will always have unwavering devotion for you and Dwijapravara! I will always reside invisible near this ashram of yours. 361॥ |
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