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mahabharat 13.15.359-360: तुम अपने बन्धुओं और बन्धुओं के साथ एक कल्प तक अमृत सहित दूध-भात का भोजन करते रहो। तत्पश्चात् तुम मुझे प्राप्त करोगे। तुम्हारे बन्धु-बान्धवों, कुल और वंश की परम्परा सदैव अक्षय रहेगी।   |   mahabharat अध्याय 13.15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 359-360
 
 
श्लोक  13.15.359-360 
क्षीरोदनं च भुङ्क्ष्व त्वममृतेन समन्वितम्॥ ३५९॥
बन्धुभि: सहित: कल्पं ततो मामुपयास्यसि।
अक्षया बान्धवाश्चैव कुलं गोत्रं च ते सदा॥ ३६०॥
 
 
अनुवाद
तुम अपने बन्धुओं और बन्धुओं के साथ एक कल्प तक अमृत सहित दूध-भात का भोजन करते रहो। तत्पश्चात् तुम मुझे प्राप्त करोगे। तुम्हारे बन्धु-बान्धवों, कुल और वंश की परम्परा सदैव अक्षय रहेगी।
 
You, along with your brothers and relatives, continue to enjoy the food of milk and rice along with nectar for one Kalpa. After that you will attain me. The tradition of your relatives, clan and clan will always remain inexhaustible.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)