श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 358-359h
 
 
श्लोक  13.15.358-359h 
अक्षयं यौवनं तेऽस्तु तेजश्चैवानलोपमम्।
क्षीरोद: सागरश्चैव यत्र यत्रेच्छसि प्रियम्॥ ३५८॥
तत्र ते भविता कामं सांनिध्यं पयसो निधे:।
 
 
अनुवाद
तुम्हें चिर यौवन और अग्नि के समान तेज प्राप्त हो। क्षीरसागर तुम्हें सहज ही उपलब्ध हो जाएगा। जहाँ कहीं भी तुम अपनी प्रिय वस्तु की इच्छा करोगे, तुम्हारी सभी इच्छाएँ पूर्ण होंगी; और तुम्हें क्षीरसागर का सामीप्य प्राप्त होगा।
 
May you get eternal youth and brilliance like fire. The ocean of milk will become easily available to you. Wherever you desire something dear to you, all your wishes will be fulfilled; and you will get the proximity of the ocean of milk. 358 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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