श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 351
 
 
श्लोक  13.15.351 
सर्वग: सर्वभूतात्मा सर्वभूतभवोद्भव:।
आस्ते सर्वगतो नित्यमदृश्य: सर्वदैवतै:॥ ३५१॥
 
 
अनुवाद
जो सर्वत्र विचरण करते हैं, वे ही सब प्राणियों के आत्मा हैं और सबकी उत्पत्ति और वृद्धि के कारण हैं। वे सर्वव्यापी परमेश्वर समस्त देवताओं के लिए सदैव अदृश्य रहते हैं॥351॥
 
‘He who moves everywhere is the soul of all beings and the cause of birth and growth of all beings. This omnipresent Supreme Lord always remains invisible to all gods.॥ 351॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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