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श्लोक 13.15.344  |
यं न पश्यन्ति चैवाद्धा देवा ह्यमितविक्रमम्।
तमहं दृष्टवान् देवं कोऽन्यो धन्यतरो मया ॥ ३४४॥ |
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| अनुवाद |
| जिनको देवता भी आसानी से नहीं देख सकते, उन महाबली महादेवजी का मैंने प्रत्यक्ष दर्शन किया है; अतः मुझसे बढ़कर धन्यवाद का पात्र और कौन हो सकता है ?॥344॥ |
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| I have had a direct vision of that mighty Mahadevji, whom even the gods cannot see easily; therefore who else can be more deserving of thanks than me?॥ 344॥ |
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