|
| |
| |
श्लोक 13.15.342  |
अब्रुवं च तदा देवं हर्षगद्गदया गिरा।
जानुभ्यामवनीं गत्वा प्रणम्य च पुन: पुन:॥ ३४२॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| तब मैंने भूमि पर घुटने टेककर भगवान् को बारंबार प्रणाम किया और हर्षपूर्वक महादेवजी से इस प्रकार कहा -॥342॥ |
| |
| Then I knelt down on the ground and bowed down before the Lord again and again, and with joyful words spoke to Mahadevji as follows -॥ 342॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|