श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 341
 
 
श्लोक  13.15.341 
एवमुक्तस्य चैवाथ महादेवेन धीमता।
हर्षादश्रूण्यवर्तन्त रोमहर्षस्त्वजायत॥ ३४१॥
 
 
अनुवाद
जब परम बुद्धिमान महादेवजी ने ऐसा कहा, तब मेरे नेत्रों से आनन्द के आँसू बहने लगे और मेरा सारा शरीर रोमांचित हो गया ॥341॥
 
When the most intelligent Mahadevji said this, tears of joy started flowing from my eyes and my entire body felt thrilled. 341॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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