श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 337
 
 
श्लोक  13.15.337 
भगवन् देवदेवेश लोकनाथ जगत‍्पते।
लभतां सर्वकामेभ्य: फलं त्वत्तो द्विजोत्तम:॥ ३३७॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! देवदेवेश्वर! लोकनाथ! जगत्पति! यह द्विजश्रेष्ठ उपमन्यु आपसे अपनी समस्त कामनाओं के अनुसार इच्छित फल प्राप्त करे ॥337॥
 
Lord! Devdeveshwar! Loknath! Jagatpati! May this Dwijashreshtha Upamanyu get the desired results from you as per all his wishes. 337॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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