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श्लोक 13.15.337  |
भगवन् देवदेवेश लोकनाथ जगत्पते।
लभतां सर्वकामेभ्य: फलं त्वत्तो द्विजोत्तम:॥ ३३७॥ |
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| अनुवाद |
| हे प्रभु! देवदेवेश्वर! लोकनाथ! जगत्पति! यह द्विजश्रेष्ठ उपमन्यु आपसे अपनी समस्त कामनाओं के अनुसार इच्छित फल प्राप्त करे ॥337॥ |
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| Lord! Devdeveshwar! Loknath! Jagatpati! May this Dwijashreshtha Upamanyu get the desired results from you as per all his wishes. 337॥ |
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