श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 328-329h
 
 
श्लोक  13.15.328-329h 
प्रसीद मम भक्तस्य दीनस्य कृपणस्य च॥ ३२८॥
अनैश्वर्येण युक्तस्य गतिर्भव सनातन।
 
 
अनुवाद
हे सनातन प्रभु! मुझ अपने दीन-दुखी भक्त पर प्रसन्न होइए। मैं धनहीन हूँ। आप ही मेरे रक्षक हैं।
 
Eternal God! Please be pleased with me, your poor and sad devotee. I am devoid of wealth. You alone are my protector. 328 1/2.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas