श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 307
 
 
श्लोक  13.15.307 
नित्यमुद्‍बद्धमुकुटे महाकेयूरधारिणे।
सर्पकण्ठोपहाराय विचित्राभरणाय च॥ ३०७॥
 
 
अनुवाद
आप सदैव अपने सिर पर मुकुट धारण करते हैं। आप अपनी भुजाओं में विशाल कंगन पहनते हैं। आपके गले में सर्पों का हार है और आप विचित्र आभूषणों से सुसज्जित हैं। आपको नमस्कार है। 307।
 
You always wear a crown on your head. You wear huge bracelets on your arms. A necklace of snakes adorns your neck and you are adorned with strange ornaments. Salutations to you. 307.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas