श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 305
 
 
श्लोक  13.15.305 
खचराय नमस्तुभ्यं गोचराभिरताय च।
भूचराय भुवनाय अनन्ताय शिवाय च॥ ३०५॥
 
 
अनुवाद
हे चन्द्रमा और सूर्य के रूप में आकाश में विचरण करने वाले देव, आपको नमस्कार है । गौओं के चरने के स्थान से आपको विशेष प्रेम है । आप पृथ्वी पर विचरण करते हैं और तीनों लोकों के स्वरूप हैं । आप अनंत हैं और शिवस्वरूप हैं । आपको नमस्कार है ॥305॥
 
Salutations to you, the god who roams the skies in the form of the moon and the sun. You have special love for the place where cows graze. You roam on the earth and are the form of the three worlds. You are infinite and are the form of Shiva. Salutations to you.॥ 305॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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