श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 304
 
 
श्लोक  13.15.304 
नमोऽग्निमुखनेत्राय सहस्रशशिलोचने।
अग्निरूपाय कान्ताय नमोऽस्तु गहनाय च॥ ३०४॥
 
 
अनुवाद
आपके मुख और नेत्रों में अग्नि निवास करती है। आपके नेत्र हजारों चंद्रमाओं के समान चमकते हैं। आप अग्निस्वरूप हैं, सुंदर रूप वाले हैं, दुर्गम एवं गहन (वनीय) हैं। आपको नमस्कार है ॥304॥
 
Fire resides in your face and eyes. Your eyes shine like thousands of moons. You are of the form of fire, have a beautiful form and are inaccessible and deep (forest). Salutations to you. ॥ 304॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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