श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  13.15.30 
शूरं बलवतां श्रेष्ठं कान्तरूपमकल्मषम्।
आत्मतुल्यं मम सुतं प्रयच्छाच्युत माचिरम्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
अच्युत! आप मुझे अपने समान वीर, बलवानों में श्रेष्ठ, सुन्दर रूप से युक्त तथा पापरहित पुत्र दीजिए। इसमें विलम्ब नहीं करना चाहिए॥30॥
 
Achyuta! Please give me a son as brave as you, the best among the strong and endowed with beautiful beauty and without any sin. There should be no delay in this.॥ 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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